झांसी की रानी

Pramod Kumar Saini
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खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी

नमस्कार मेरी रचना Jhansi Ki Rani (खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी) 1857 की क्रांति के सभी वीरों और वीरांगनाओ के श्री चरणों में सप्रेम भेंट है। इस  कविता का मुखड़ा मैंने सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी से लिया है। 

Jhansi Ki Rani

खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी

1857 की क्रांति की बड़ी अजब कहानी थी,
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

पेशवा बाजीराव की छबीली सबसे न्यारी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

गुरु तांत्या की बाई सा को
नींव ब्रिटिश राज की हिलानी थी,
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

भागीरथीबाई और मोरोपंत तांबे की मणिकर्णिका
को स्वतंत्रता की आग हर दिल में जलानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

गंगाधर राव की लाडो रानी ने कसम अनूठी ठानी थी,
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

दामोदर राव की माता को अलख स्वराज की जगानी थी,
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

झलकारी बाई के नेतृत्व में नारी सेना उसे बनानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

स्वाभिमान की जोत हर दिल में जगानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

आजादी के हवन कुंड में देनी उसे कुर्बानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

कानपुर के नाना साहब की मुँह बोली बहिन
ने कीमत आजादी की पहचानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

वीरों की हर गाथा याद उसे जुबानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

वो लक्ष्मीबाई माँ दुर्गा की कोई निशानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

फिरंगियों के लिये वो साक्षात भवानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

1857 के वीरों में इकलौती वो मर्दानी थी
खूब लड़ी वो तो झांसी वाली रानी थी।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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